बालक को शिक्षा देने के 15 तरीके । 15 ways to teach a child ।

बालक को शिक्षा देने के 15 तरीके । 15 ways to reach a child ।
बालक को शिक्षा देने का का उत्तरदायत्व , माता - पिता शिक्षक और समाज तीनों पर है। पारस्परिक सहयोग से ही बालक को अच्छी शिक्षा दी जा शक्ति है। 

1. बालक को इस समय साधारण तौर पर लिखने , पढ़ने तथा गणित की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए । क्योंकि इन्हीं के माध्यम से जीवन के अनेक समस्या का हाल कर पाता है । और इन्हीं के माध्यम से वह अन्य शक्तियों का विकाश कर पाता है ।

2. बालक को जो आप शिक्षा दे,  रहे उसका  व्यावहारिक रूप होना आवश्यक है । अगर बालक की शिक्षा अव्यावहारिक हो । उसके जीवन की दिशा का निर्माण नहीं हो पाएगा। 

3. इस अवधि में बालक को खेल द्वारा अथवा रचनात्मक क्रियाशील द्वारा शिक्षा दी जानी चाहिए ।

4. बालक की शिक्षा प्रेम और सहानुभूति पर आधारित होनी चाहिए । 
5 . इस अवस्था मैं बालक को भाषा में बहुत रुचि होती है ।  इस  बात पर ध्यान देना आवश्यक है । बालक भाषा का अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त हो । 

6. बालक के संतुष्टि के लिए अलग - अलग  विषय पर ज्ञान देना आवश्यक है । 
जैसे । भाषा , गणित , विज्ञान , सामाजिक अध्ययन , चित्रकला , सुलेख , पत्र लेखन , निबंध रचना   आदि  । 

7. बालक में जिज्ञासा  की प्रवृति होती है। तो उसे  दी जाने वाली शिक्षा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए । जिससे उसकी इस प्रवृत्ति की पुष्टि हो । 
6. बालक की रुचियों में भिन्नता और परिवर्तन शीलता होती है । तो उसकी पुस्तक की विषय सामग्री में रोचकता तथा विभिन्नता होनी  चाहिए । ।
जैसे - पशु , हास्य स्पद , प्रसंग , नाटक , वार्तालाप , वीर पुरुष के साहसिक कार्य , और आश्चर्यजनक बातें , आदि 

7. इस अवधि में बालक की रुचियों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है । तो पाठ्यविषय और शिक्षण विधि में , उसकी रुचियों के अनुसार , परिवर्तन किया जाना चाहिए । 
8. पियागेत (Piaget)  ने लिखा है। लगभग 8 वर्ष का बालक अपने नेतिक मूल्यों का निर्माण और समाज के नेतीक नियमो में विश्वाश करने लगता है । उसे इन मूल्यों के उचित निर्माण के लिए नेतीक , शिक्षा दी जानी चाहिए ।
9. बालक के संवेगो को यथासंभव दबाना नहीं चाहिए। बल्कि उन्हें तृप्त करना चाहिए , तथा विद्यालय में , ऐसे अवसर देने चाहिए , जिससे वे उनका प्रदर्शन कर सके , ।

10. बालक में संचय की की प्रवृति होती है । उसके माता - पिता और शिक्षक का कर्तव्य है । की उस शिक्षा प्रद वस्तुओं का संचय होना चाहिए । 

11. बालक को रचनात्मक कार्य में अधिक रुचि होती है ।तो विद्यालय में विभिन्न प्रकार के रचनात्मक कार्यों की व्यवस्था की जानी चाहिए । 
12. बालक में निरुदेस्या भ्रमण करने की प्रवृति होती है ।  उनकी इस प्रवृति को  तुष्ट करने के लिए । पर्यटन और स्काउंटिंग को उसकी शिक्षा का अंग होना चाहिए । 

13. बालक की विभिन्न मानसिक रुचियों को संतुष्ट करके उसकी तृप्ति रुचियों का अधिकतम विकाश किया जाना चाहिए ।  इस कार्य मैं सफलता प्राप्त करने के लिए , विभिन्न प्रकार की सहगमी कार्यों की व्यवस्था होनी चाहिए । 
14. बालक को समूह में रहने की प्रबल प्रवृति होती है । 
तो उसे दी जाने वाली शिक्षा की स्वरूप ऐसा होना चाहिए । जिससे उसकी इस प्रवृति की तुष्टि हो, अत ; सामूहिक खेल और शारीरिक व्यायाम - प्राथमिक विद्यालय का सामूहिक अंग होना चाहिए ।

15. बल्या बस्ता में केवल पढ़ने पर ही जोर नहीं देना चाहिए । अपितु पाठानअंतर सहगामी क्रियाओं को भी इनके पाठ्क्रम में सम्मिलित करके बालक के अंदर छुपी हुई शक्तियों को विकसित करना चाहिए । ऐसा करने से बालक में व्यक्तित्व का विकास उचित दिशा में होता है 
अन्यथा उसके विकास में काफी बाधाएं आ जाती है ।

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